गेहूं की विपुल उत्पादन तकनीक
चेतना सिन्हा, डॉ. सुनील कुमार, रितुरानी और नेहा सिंह कश्यप


खेत की तैयारी: अक्टूबर एवं नवम्बर माह में खेत की 3-4 इन्च गहरी जुताई करें। समय और जलसंसाधन उपलब्धता होने पर खेती की तैयारी हेतु सिंचाई करें जिससे सुसुप्त खरपतवार बीज जागृत होकर उगते हैं और जुताई द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
बीजोपचार: भूमि एवं बीज जनित रोगों से बचाव हेतु बीजोपचार अवश्य करें। फफूंदनाशक सुपरयाली 75 डब्ल्यू.पी. 3 ग्राम मात्रा/कि.ग्रा. बीज दर से 5-5 ग्राम मात्रा/कि.ग्रा. बीज दर से उपचारित कर तुरंत बोनी करें।
बीज-दर एवं बुवाईः-
समान्यतः 100 कि.ग्रा. बीज/हेक्टेयर हेतु पर्याप्त होता हैं। देर से बोनी की स्थिति में 20-25 प्रतिशत अधिक बीज का उपयोग करंे।
- पलेवा वाले खेत में बतर आने पर जुताई कर बोनी करें।
- सूखे में बोनी कर सिंचाई करने पर अंकुरण अच्छा होता है तथा समय और सिंचाई जल दोनों की बचत होती है।
- उर्वरक को सीडड्रिल द्वारा 4 इंच की गहराई व बीज को 2-3 इंच गहराई पर बोनी करें।
- सूखे बोनी में गहराई उथली (1-1 इंच) करें।
बेनी का समयः-असिंचित अवस्था: 20 अक्टूबर से 31 अक्टूबर अद्धिसिंचित अवस्था: 10 नवम्बर तक।
सिंचित:-
समय से: 10-24 नवम्बर
देरी से: 25 दिसम्बर तक अत्यंत देर से: जनवरी के प्रथम सप्ताह तक
खाद प्रबंधन: विपुल उत्पादन हेतु खेत में कार्बोनिक तत्वों (जीवॉश्म तत्व) की पूर्ति हेतु गोबर की खाद/कम्पोस्ट 10 टन/हेक्टेयर व मुर्गी की खाद 2.5 टन/हेक्टेयर के साथ हरी खाद या वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग जून से अक्टूबर तक अवश्य करें। कच्ची खाद से दीमक का प्रकोप अधिक होता हैं।
उर्वरक प्रबंधन:-सामान्यतयाः उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि मिट्टी परीक्षण की सुविधा उपलब्ध नहीं तो 52 किलो नवरत्ना डी ए पी, 74 किलो युरिया तथा 27 किलोपोटाश या 68 किलो नवरत्ना 12: 32: 16 एन. पी. के 78 किलो पोटाश तथा यूरिया तथा 7 किलोपोटाश या 27 किलो पोटाश का प्रयोग प्रति एकड़ करें तथा 40 किलो पीपी एल फास्फोजिप्सम के प्रयोग से गंधक की पूर्ति करे
- असिंचित अवस्था में पूरा उर्वरक बोनी से पहले खेत में मिलाएं।
- अर्द्धसिंचित अवस्था में आधी नत्रजन तथा स्फुर एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा बोनी के पहले दे तथा शेष आधी नत्रजन प्रथम सिंचाई पर दें।
- सिंचित अवस्था में नत्रजन की आधी तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी से पहले खेत में दे फिर शेष आधी नत्रजन को बराबर मात्रा में प्रथम व द्वितीय सिंचाई पर (यूरिया के रूप में) दें।
- मृदा परीक्षण आधार पर यदि जस्ते की कमी हो तो प्रति तीसरे वर्ष अंतिम व खरनी के समय 25.कि/हेक्टेयर की दरसे खेत में भुरकाव कर मिलाये।
किस्में:-
| परिस्थिति | संयुक्त किस्में |
| शरबती | |
| असिंचित एवं अद्ध सिंचित | सुजाता, जेडब्ल्यू.17, एच.डब्ल्यू. 2004(अमर )एच.आई. 150 |
| सिंचित समय से | एच.आई.1077(मंगला) |
| देरी से | जी.डब्ल्यू.-173 |
किस्मों का चयन:-
भौतिक एवं अनुवंषिक रूप से शुद्व, उत्तम अंकुरण, स्वस्थ पौधों को जन्म देने वाले बीज का ही चुनाव करें। इसके लिए प्रमाणित बीज का उपयोग करें। बोई गई किस्म यदि शुद्व नहीं है और अवांछित पौधे भी खेत में हैं तो अगले वर्ष बीज हेतु आवश्यकतानुसार खेत से इन पौधों एवं खरपतवारों को निकालकर किस्म को शुद्व कर लें और साफकर अलग से भण्डारित करें।
रोगनियंत्रण:- मध्य भारत में गेहूं में मुख्य रूप से भूरा व काला गेरूआ का प्रकोप होता है इससे बचाव हेतु नवीनतम, अवरोधी/सहनशील किस्में ही बोएं।
– गेरूआ नियंत्रण हेतु बीज को उपचारित करके बुवाई करें।
– एक फसल और एक ही किस्म उत्पादित न करें।
– गेरूआ आने पर सिंचाई कम करें व युरिया का उपयोग भी कम करें।
कीट नियंत्रण:
मुख्य रूप से दो कीट नुकसान पहुंचाते हैं:
दीमक- इसको नियंत्रित करने हेतु-रत्नामेट 10 जी 12 कि.ग्रा./हे. जुताई के समय या रत्नाक्लोर 2.ई.सी. खडी फसल में 2-3 ली/हे. की दर से सिंचाई जल के साथ टपक पद्धति से दें।
तनाछेदक मक्खी:-
नवम्बर, दिसम्बर माह में डायमेथेमेट 30 ई.सी. दवा 750 कि.ली. या ऑक्सीडेमेटॉनमिथाइल 25 ई.सी. 800 मि.ली. दवा 700-800 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।
खरपतवार नियंत्रण:-
– स्वच्छ बीज उपयोग करें।
– बोनी के एक महीने बाद हैण्डहो एवं डोरा चलाए।
– चौडी पत्तीवाले खरपतवारों के लिए पाराक्लीन 2,4-डी, सोडियमसाल्ट. 4 कि.ग्रा./हे. बोनी के 30-40 दिन पश्चात फ्लैटफैननो जल का उपयोग करते हुए छिडकाव करें। नीदानाषकों का उपयोग करते समय खेत में नमी आवश्यक हैं।
चूहा नियंत्रण:-प्रकोप होने पर फसल में 3 दिन तक केवल आटे की गोलियाँ बिलों के मुंह के पास रखें। चौथे दिन 3 भाग आटे में एक भाग जिंक फॉस्फाइड दवा मूंगफली तेल का उपयोग करते हुए गोली बनाकर बिल के अंदर गोलियां रखकर गीली मिट्टी से बिल का मुंह बंद करें।
कटाई एवं गहाई:- कटाई गहाई किस्मों के आधार पर करें। जल्दी पकने वाली किस्मों को जल्दी काटें। शरबती, चँदौसी किस्मों की कटाई पहले फिर कठिया किस्मों को कांटे जिससे दानें झडे नहीं। कटाई पूर्ण परिपक्वता अवधि पर ही करें। अपरिपक्व अवासी पर कटाई से गुणवत्ता नष्ट होती है तथा भण्डारण में कीट भी लगते हैं।
भण्डारण:- भण्डारण करते समय नमी 8-10 प्रतिषत होना चाहिए अनाज अच्छी तरह सूखने के पषचात ही भण्डारित करें।
– भण्डारण में ई.डी.बी. के एप्प्यूल,सेल्फॉस आदि कीट नाशकों का उपयोग कर सकते हैं।
– भण्डारण में बोरियाँ या कोठि या लकडी का आधार बनाकर रखें।










