उद्यानिकी

मिर्च की उत्पादन तकनीक

मनोज कुमार सिंह, डॉ. राम लखन सिंह, डॉ. पी के मिश्रा

मिर्च, भारत की प्रमुख मसालों वाली फसलों में एक है। मिर्च की व्यवसायिक खेती करने से अधिक लाभ कमाया जा सकता है। प्रायः सभी लोग कम या ज्यादा मात्रा में मिर्च का प्रयोग अवश्य करते हैं। अधिक तीखी (चरपरी), हरी या लाल मिर्च मसालों के रूप में, तथा मध्यम चरपरी लाल मिर्च अचार बनाने में प्रयोग की जाती है तथा भारत, मिर्च का सबसे बड़ा निर्यातक भी है।

उन्नतशील प्रजाति
मुक्त परागित
एल.सी.ए. 235: इस किस्म के पौधें सघन, छोटी-छोटी गाँठो वाले छातानुमा होते हैं। पŸिायॉ छोटी, फल 5-6 सेमी., लम्बे नुकीले, गहरे हरे रंग के काफी चरपरे होते हैं। हरी सब्जियों के साथ प्रयोग करने के लिए यह उपयुक्त किस्म है। अचार बनाने व निर्यात के लिए भी यह उपयुक्त किस्म है। इसके हरे फलों की पैदावार 75-100 कुन्तल तथा सूखे फलों की 37 कु0/है0 होती है।
के.ए.: इस किस्म के पौधें छोटे होते हैं तथा फल नीचे की तरफ लगतें हैं। हरे फल के उत्पादन के लिए यह अच्छी किस्म है। इस किस्म में फलों की तुड़ाई 3-4 बार में समाप्त हो जाती है। हरे फल का उत्पादन लगभग 200 कु0/है0 तथा सूखे फलों की पैदावार 60 कु0/है0 होता है। इसकी फसल के बाद गेहॅू आसानी से बोया जा सकता है। इस किस्म के पौधों की रोपाई 45ग45 सेमी0 पर करनी चाहिए।
पूसा ज्वालाः इस किस्म के पौधे छोट, झाड़ीनुमा, पŸिायाँ तथा फल हल्के हरें (पीलापन) रंग के, फल 10-12 सेमी0 लम्बे, पतले तथा अधिक चरपरे होते हैं। फल पकने के बाद लाल रंग के जो सूख्ने पर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। इसके हरे फलों की पैदावार लगभग 190 कु0/है0 तथा सूखे फलों की पैदावार लगभग 54 कु0/है0 होती है।
पूसा सदाबहारः इसके पौधें सीधे 60-80 सेमी0 लम्बे, पŸिायॉ सामान्य किस्मों की अपेक्षा अधिक लम्बी व चौड़ी होती है। फल 6-14 के गुच्छों में लगते हैं तथा फल का निचला हिस्सा ऊपर की तरफ मुड़ा होता है। फल आकार में 6-8 सेमी0 लम्बे तथा 3.4 से 4.0 मिमी0 मोटाई के होते हैं। इस किस्म की मुख्य विशेषता यह है कि एक बार पौधा लगा देने पर 2-3 वर्षों तक फल मिलते रहते हैं। इसके हरे फलों की पैदावार 110-120 कु0/है0 तथा सूखे फलों की पैदावार लगभग 40 कु0/है0 होती है।

संकर किस्में
तेजस्वनीः- इसकी फलियॉ मध्यम आकार की तथा गहरे हरे रंग की होती है। यह एक अच्छी ऊपज देने वाली किस्म हे। यह उपयुक्त दशाओं मे 300 क्विंटल तक हरे फल देती है।

भूमि और भूमि की तैयारीः- इसकी अधिक उपज के लिए बलुई दोमट व दोमट भूमि अच्छी पायी गयी है। ऐसी मिट्टी जिसका पी.एच. मान 6 से 7.5 के बीच हो, खेती के लिए उपयुक्त होती है। खेत की दो-तीन जुताई करके पाटा लगा देते है ताकि खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाये।
बुआईः- अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि मिर्च की बुआई उपयुक्त समय से करें। उŸार भारत के मैदानी क्षेत्रों में पौधशाला में बीज की बुआई का उपयुक्त समय जून-जुलाई तथा रोपड़ का उचित समय जुलाई-अगस्त है।

बीज की मात्राः- एक हेक्टेयर खेत में मिर्च की खेती के लिए 200-350 ग्राम बीज की आवयकता होती है।

पौधशाला में बीज की बुआईः- मिर्च के बीज की सर्वप्रथम पौधशाला में बुआई करके पौध तैयार कर लेते हैं। तत्पश्चात् पौध तैयार होने पर इनका रोपण मुख्य खेत में करते हैं। बीज शैय्या के लिए जीवांशयुक्त मिट्टी काफीय उपयुक्त होती है। अतः मिट्टी में गोबर या कम्पोस्ट की खाद डालकर अच्छी प्रकार मिला दें। अच्छी पौध तैयार करने के लिए प्रति वर्ग मीटर की दर से 10 ग्राम डाई अमोनिया फास्फेट और 1 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद मिला दें। बीजों को ऊँची उठी हुई क्यारियों में डालना उचित होता हे। क्यारियॉ जमीन की तरह से 20-25 सेमी0 उठी होनी चाहिए। क्योरियों की लम्बाई 3 मीटर तथा चौड़ाई 1 मीटर रखते हैं। साधारणतया यह देखा गया है कि बीज चाहे पंक्ति में बाये गये हों या छिटककर यदि घने रहते है तो आर्द्रगलत बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। अतः बुआई अधिक घनी नहीं करनी चाहिए। पंक्ति में बुआई के लिए, एक पंक्ति से दूसरे पंक्ति की दूरी क्यारी की लम्बाई के लम्बत् या चौड़ाई के समानान्तर 5-6 सेमी0 रखें व इन्हीं पंक्तियों में बीज की बुआई करें। बीज बुआई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या पत्ती की खाद (कम्पोस्ट खाद) से ढक दें जिससे ऊपर की मिट्टी बैइने न पायें। तत्पश्चात् फुआरें से हल्की सिंचाई करें। अब इन क्यारियों को धूप व ठंड से बचाने के लिए घास-फॅूस की छप्पर या सरकण्डे से ढक दें। जब बीज पूर्णतया जम जायें तो घास-फूॅस हटा लें। तथा आवश्यकतानुसार फुहारे से सिंचाई करते रहें, एक सप्ताह के अन्तराल पर बीज शैय्या में पौधों को डायथेन एम.-45 या थिरम/मैंकोजेब के 0.2 प्रतिशत घोल (2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी) से उपचारित करें। लगभग 4 सप्ताह में पौध रोपण योग्य तैयार हो जाती है।

रोपण एवं दूरीः- जहाँ तक हो सके मिर्च के पौधों को रोपण शाम के समय करना चाहिए। साफ मौसम या तेज धूप के समय रोपण करने से पौध अच्छी प्रकार अपनी वृद्धि नहीं कर पाते। रोपण के बाद पौधों को फुहारें की सहायता से दो-तीन दिनों तक सुबह शाम सिंचाई करें। मिर्च में रोपण के लिए उचित दूरी ऋतुओं और किस्मों के अनुसार अलग-अलग होती है। साधारण तोर पर मिर्च की रोपाई पंक्ति से पंक्ति 45-45 सेमी. व पौध से पौध 30-45 सेमी. रखना चाहिए।

खाद एवं उर्वरकः- मिर्च की पैदावार प्रयुक्त खाद एवम् उर्वरकों की मात्रा व किस्म पर निर्भर करती है। अच्छी उपज के लिए 25-30 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय खेत में मिलावें तथा तत्व के रूप में 100-120 किलोग्राम नाईट्रोजन, 40-60 किग्रा0 फास्फोरस, 30-50 किग्रा0 पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी या फास्फोरस व पौटाश की पूरी मात्रा रोपण से पहले दंे तथा शेष नाइट्रोजन को दो भागों में बाँटकर रोपण से 25 व 45 दिनों बाद खड़ी फसल में डालें।
मिर्च में बायोफर्टीलाईजर का प्रयोग अच्छा पाया गया है। एजेटोवेक्टर या एजोस्पाईरीलिपम से बीज उपचारित करने पर बढ़ी उपज प्राप्त हुई है। इसके लिए 2 किग्रा0 एजोस्पाईरीलियम को 20 किग्रा कम्पोस्ट में मिलाकर भूमि मे डालते हैं।

सिंचाईः- पौध रोपण के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई करना अत्यन्त आवश्यक है। उसके बाद आवश्कतानुसार सिंचाई करना चाहिए। मिर्च में पानी की मात्रा मिट्टी की किस्म, क्षेत्र में होने वाली वर्षा की मात्रा और उगाई जाने वाली किस्म करना चाहिए। मिर्च में पानी की मात्रा मिअृअी की किस्म, क्षेत्र में होने वाली वर्षा की मात्रा और उगाई जाने वाली किस्म पर निर्भर करती है। यदि वर्षा कम हो रही हो तो 10-15 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। गर्मी के महीनों में सिंचाई एक सप्ताह के अन्तराल पर करें। ध्यान दें कि वर्षा का पानी खेत में ज्यादा समय तक न रहें अन्यथा पौधे मर जाते हैं।

अन्तः शस्य क्रियाएँ:
सिंचाई करने के बाद मिर्च की खेत में अनेकों प्रकार के खरपतवार उग आते हैं अतः समय-समय पर निकाई करते रहना चाहिए। भूमि में हवा का आवागमन सुचारू रूप से होता रहे इसके लिए सिंचाई के बाद हल्की गुडत्राई करके पौधें की जड़ों के पास मिट्टी चढ़ा दें। सिंचाई के दौरान यह ध्यान रखें कि पानी जड़ों तक न पहुँचें और पूरी मिट्टी बैठने न पावें। स्टाम्प 3.3 लीटर 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर रोपण से पूर्व खेत में प्रयोग करने से खरपतवार नहीं उगते हैं व अच्छी उपज होती है।

तुड़ाईः-
हरी मिर्च के लिए तुडत्राई हफल लगने के 15-20 दिन बाद कर सकते हैं। परन्तु यदि सूखी लाल मिर्च के लिए तुड़ाई करनी हो तो एक या दो बार हरी मिर्च की तुडत्राई करके मिर्च पौध पर ही पकने के लिए छोड़ दी जाती है। इस फूल बहुलता से आते हैं और पैदावार भी ज्यादा मिलती है। एक तुड़ाई से दूसरे तुड़ाई का अन्तराल 15-20 दिन तक रखते हैं। फलों की तुड़ाई उनके पूर्ण विकसित होने पर ही करनी चाहिए।

प्रमुख कीट व रोग:-
थ्रिप्सः- इस कीट के शिशु तथा वयस्क दोनो पŸिायों से रस चूसकर नुकसान पहुॅचाते हैं। वयस्क कीट का पंख कटी-फटी होती है। प्रौढ़ कीट 1 मिमी0 से कम लम्बा होता है। यह कोमल हल्के पीले भूरे रंग का होता है। एक मादा 50-60 अण्डे देती है। इसके प्रकोप से पŸिायाँ सूख जाती है जिसका असर प्रतिकूल फसल की पैदावार पर होता है।
नियंत्रणः- मिर्च के बीज को गाऊचों (70 डब्लू.एस.) 2.5 ग्राम प्रति किग्रा0 बीज की दर से उपचारित कर पौधशाला में बुआई करें। मुख्य खेत पर कानफिडोर 200 एस.एल. का 0.3 मिली0 प्रति लीटर पानी के साथ घोल बनाकर छिड़काव करें। फल लगने से 30 दिन पहले कानफिडोर का प्रयोग बन्द कर देना चाहिए। रोगार 1.5 मिली0 प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिड़कने से भी थ्रिप्स का नियंत्रण सम्भव है। इसव दवा का प्रयोग फूल लगने के लगभग 10 दिन पहले बंद कर देना चाहिए।

पीली माइटः- यह पीले रंग की छोटी माइट है इसकी पीड्ग पर सफेद धारियॉ होती है। यह आकार में इतनी छोटी होती है जो आसानी से दिखाई नही देती। इसके प्रकोप से होने पर पर्ण कुंचन रोग (लीफ कर्ल) की तरह पत्तों में सिकुड़ाव आ जाता है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनो ही पŸिायों का रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं। इसके अत्यधिक प्रकोप होने पर पौधों की बढ़वार एकदम रूक जाती है, और फूलने-फलने की क्षमता प्रारूः समाप्त हो जाती है।
नियंत्रणः- डायकोफाल 18.5 ई.सी. का 2.5 मिली0 को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर या सल्फर धूल (10 प्रतिशत धूल) का 20-25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से 15 दिन में अन्तराल पर बुरकाव प्रभावकारी पाया गया है।

शीर्षमरण रोग (डाइबैक) एवं फल सड़न- इस रोग में पौधें का ऊपरी भाग सूखना प्रारम्भ होता है और नीचे तक सूखता जाता है। प्रारम्भिक अवस्था में यह टहनियाँ गीली होती है और उस पर रोएॅदार कवक दिखाई देती है। रोगग्रसित पौधों के फल सड़ने लगते हैं। लाल फलों पर इस रोग का प्रकोप अधिक होता है।
नियंत्रणः- इससे बचाव के लिए कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोयें। क्षतिग्रस्त टहनी को सुबह के समय कुछ नीचे से काट कर इकट्ठा कर लें एवं जला दें। डाइफोल्टान (2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी) तथा कार्बेन्डाजिम 1.0 प्रतिशत (1 ग्राम/लीटर पानी) घोल का छिड़काव बारी-बारी करें।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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