झींगा पालन
हरि प्रसाद मोहले’, डॉ. ओ. पी. सोनवानी’, डॉ. एन. सारंग’ एवं पारगी नरेन्द्र


हमारे देश में कई प्रकार कि मछली पाली जाती है इनमें झींगा पालन का विशेष महत्व है। इसका कारण यह है कि झींगों में प्रोट्रिन के अलावा और भी पोषक तत्व बहुत अच्छी मात्रा में में मिलती है। जिसके कारण बजार व भेाजनालय में भी ज्यादा मांग है साथ ही साथ अंतर-राँष्ट्रीयो में भी बहुत ज्यादा माँग बढ़ गयी है। भारत में झींगा पालन अभी तक बहुत छोटे स्तर में किया जाता है। इसलिए इसका ऊचें स्तरों में बढ़ने कि संम्भावना अच्छा है। जिससे किसान कम समय में ज्यादा मुनाफा कमा सकता है।
पिछले कुछ सालो में मत्स्य पालन भारत में महत्वपूर्ण विषय बन गया है। इनमें होने वाली मुनाफे को देखकर बहुत से लोग अपना भविष्य बना रहे है। मत्स्य पालन में भारत चीन के बाद दुसरे स्थान पर है। समान्यता झींगा खारे पानी में हि होता है परन्तु विज्ञान व तकनिकों कि मदद से ऐसे प्रजातियो का विकसित किया जा चुका है जो मींठे पानी में भी इसका पालन किया जा सकता है। भारत में बहुत ज्यादा मात्रा में मीठे पानी का प्राकृतिक संसाधन जैसे- नदी, तालाब, जलाशय और पोखर आदि है जिसमें झींगा के उत्पादन के लिए उपयोग में लिया जा सकता है।

तालाब का निर्माण- झींगा पालन के लिये तालाब आप अपने व्यवसाय के अनुसार छोटा या बड़ा बना सकते है और तालाब कि न्युनतम गंहराई 1 से 1.2 मीटर का होनी चाहिए। तालाब से बरसात के अतिरिक्त पानी को निकालने के लिऐ उचित व्यवाथा होनी चाहिऐ। तालाब में जलीय पौधा होना बहुत ही लाभदायक है क्योकि झींगा दिन में छुपकर आराम करते है। मींठे पानी में झींगा पालन के लिए चुने का प्रयोग होता है और इसे ताालाब के पानी का पी0एच0 के आधार पर किया जाता है। पी0एच0 6.5 से 8.5 तक पानी के लिये आर्दश होती है। नर्सरी तालाब का आकार 0.04 एकड़ तक का निर्माण कर सकते है जिसमें झींगा का र्लावा 2500-20000 नग को डाल कर र्लावा से शिशु होने तक पालन किया जाता है। र्लावा को आप किसी प्राकृतिक संसाधन या कोई पालन करने वालो से ले सकते है। इस तरह 20-40 दिनो तक नर्सरी तालाब में पालन के बाद झींगो का आकार 3-4 ग्राम तक हो जाता है तथा इनहे बढ़े तैयार तालाब में स्थांनातरित कर देना चाहिए।
आहार- झींगे दिन में आराम तथा रात के समय भोजन के लिए तालाब में घुमते रहते है। झींगा माँस एंव वनस्पति दोनों तरह का भोजन ग्रहण करते है। अतह इनकि अच्छी वृद्वि के लिये इन्हे 80 प्रतिशत शाकाहारी और 20 प्रतिशत मांसाहारी भोजन देना चाहिये। शाकाहारी में सरसो खल्ली 40 प्रतिशत, धान का भुसा 40 प्रतिशत और 20 प्रतिशत मांसाहारी में छोटी मछली को उबालकर देना चाहिऐ। तालाब में आहार कि कमी नही होनी देनी चाहिये अन्यथा ये एक दुसरे को खा जाते है। आहार को दो माह तक 2-3 कि0ग्रा0 का व 3-6 माह तक 4-5 कि0ग्रा0 कि दर से चौड़ी मुह वाली र्बतनो में रखकर तालाब के सभी जगहो पर रख देनी चाहिए तथा इसके अलावा एंटीबाँडी दवाई का भी प्रयोग करते रहना चाहिये।

देखभाल- यदि कभी तालाब के किनारो पर बड़ी संख्या में झींगो दिखाई दे तो यह आक्सीजन की कमी का सुचक होता है। इसके लिये मशीन ऐरेटर द्वारा पानी में आक्सीजन दे या पानी को कुछ उँचाई से तालाब में आक्सीजन को पुरा किया जा सकता है। बीच-बीच में चुना का प्रयोग करे व अन्य जीवो से रक्षा करना चाहिए।
पैदावार- समान्यता तालाब में डाले गये शिशु झींगो का लगभग 50-70 प्रतिशत फिसदी तक ही जीवित बचते है इनकी वृद्वि विविधतापुर्ण होती है। यह 4-5 माह में इसका वजन 50 से 70 ग्राम तक हो जाती है अब इनकी ब्रिक्री शुरू की जा सकती है। 4-8 माह तक इसका वजन 50 से 200 ग्राम की हो जाती है। बाजारो में इनका भाव 300-500 रूपया प्रति कि0ग्रा0 रहता है जो अन्य मछलीयो कि तुलना में ज्यादा है। इस हिसाब से एक एकड़ के तालाब में करीब 3.5-4 लाख रूपये की आमदानी हो सकती है।

लाभ-
- ये कम समय और कम लागत में तैयार हो जाती है
- कम समय में ज्यादा लाभ ले सकते है
- इसमे अधिक मात्रा में प्रोटिन मिलती है, जो सेहत के लिये फायदे मंद है।









